दिल्ली में सन्नाटे का अनुराग
शोर-शराबे, प्रदूषण, भीड़ और सत्ता के शहर दिल्ली में आंदोलन को सन्नाटे में बदलने के लिए एक दिन पहले नियुक्त हुए पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने वर्दी के बजाय सफेद कपड़ों में पुलिसकर्मियों को भेजकर सोनम वांगचुक के 20 दिनों से चल रहे अनशन आंदोलन को समाप्त कराने में सफलता प्राप्त की। दिल्ली पुलिस द्वारा एक्स (पूर्व ट्विटर) पर दी गई जानकारी के अनुसार, उच्च न्यायालय के निर्देशों के आधार पर वांगचुक के स्वास्थ्य को देखते हुए यह कार्रवाई की गई।

अब तक इस आंदोलन में किसी प्रकार की हिंसा की खबर सामने नहीं आई थी, इसलिए सीधे बल प्रयोग करना कानूनी रूप से आसान नहीं था। ऐसे में शांति के प्रतीक सफेद वस्त्रों में पुलिस भेजकर आंदोलन स्थल को खाली कराया गया, जिससे सरकार पर यह सवाल भी न उठे कि बातचीत के लिए उसका कोई प्रतिनिधि क्यों नहीं आया। इस प्रकार सरकार के लिए “शांति का अनुराग” आंदोलनकारियों के लिए “सन्नाटे का उपहार” बनकर सफेद कपड़ों में आया।

आंदोलन का मुख्य चेहरा यदि अस्पताल पहुंचा दिया जाए, तो यह कहना भी कठिन हो जाता है कि उसे अंदर किया गया या नहीं। ऐसे विचार के साथ एक दिन पुराने दिल्ली पुलिस आयुक्त ने शायद स्वयं अपनी पीठ थपथपाई होगी, या फिर किसी और ने पहले ही उनकी पीठ थपथपाकर उन्हें इस जिम्मेदारी के लिए भेजा होगा—इसका पता तो पुरस्कारों की सूची आने पर ही चलेगा। तब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान भी पेपर लीक जैसे गंभीर मामले के बावजूद अपनी पीठ स्वयं थपथपा सकते हैं।

आंदोलन का मुख्य मुद्दा पेपर लीक प्रकरण में केंद्रीय शिक्षा मंत्री की जवाबदेही और अपनी जिम्मेदारी निभाने में हुई कथित लापरवाही का है। यदि ऐसी लापरवाही के बाद भी इस्तीफा देना आवश्यक नहीं माना जाता, तो अतीत में आरोप लगने पर नैतिक आधार पर इस्तीफा देने वाले नेताओं को मूर्ख मानने में भी कोई भूल नहीं होगी।
लोकतंत्र में इस प्रकार की प्रक्रियाएं शर्म का नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति और जवाबदेही का प्रतीक मानी जाती हैं। किंतु जब सत्ता की मजबूरी या कमजोरी “शांति के अनुराग” के नाम पर सामने आती है, तो वह लोकतांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से शर्मनाक प्रतीत होती है।
संपादकीय लेख
(यतिन शुक्ल एवं रवि आनंद)








